30, June 2026

संत काव्य परंपरा और स्त्री लेखन

Author(s): ललिता गुप्ता

Authors Affiliations:

शोधार्थी, हिंदी विभाग, सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय,अलमोड़ा

DOIs:10.2018/SS/202606017     |     Paper ID: SS202606017


Abstract
Keywords
Cite this Article/Paper as
References

सारांश : हिंदी की संत-काव्य परंपरा को प्रायः कबीर से आरंभ मानकर दादू, रैदास, नानक, धर्मदास आदि पुरुष संतों तक सीमित कर दिया जाता है। इस विवेचन में एक महत्वपूर्ण पक्ष सदैव उपेक्षित रह जाता है महिला संत कवयित्रियों का योगदान। प्रस्तुत शोध-पत्र इसी उपेक्षित पक्ष को केंद्र में रखकर बावरी साहिबा, सहजो बाई और दया बाई जैसी संत कवयित्रियों की काव्य-साधना का अध्ययन प्रस्तुत करता है, और यह दर्शाता है कि गुरु-महिमा, निर्गुण-सगुण समन्वय, वैराग्य, सत्संग और सामाजिक रूढ़ि-खंडन जैसे समस्त संत-मूल्यों का निर्वाह इन कवयित्रियों ने पुरुष संतों के समकक्ष ही किया। यह पत्र इस प्रश्न को भी उठाता है कि साहित्य-इतिहास में इन्हें वह स्थान क्यों नहीं मिला जो अन्य संतों को मिला।

बीजशब्द : संत काव्य, स्त्री लेखन, बावरी साहिबा, सहजो बाई, दया बाई, निर्गुण भक्ति, गुरु-परंपरा, वैराग्य, सत्संग, स्त्री-विमर्श, मध्यकालीन हिंदी साहित्य।

ललिता गुप्ता (2026); संत काव्य परंपरा और स्त्री लेखन, Shikshan Sanshodhan : Journal of Arts, Humanities and Social Sciences,      ISSN(o): 2581-6241,  Volume – 9,   Issue –  6,  Available on –   https://shikshansanshodhan.researchculturesociety.org/

संदर्भ ग्रंथ

  1. वियोगी हरि. (2004). संत सुधा सार. नई दिल्ली: सस्ता साहित्य मण्डल।
  2. चतुर्वेदी, परशुराम. (2008). संत काव्य धारा. इलाहाबाद: किताब महल।
  3. सिंह, सुधा. (2004). मध्यकालीन साहित्य विमर्श. कोलकाता: आनन्द प्रकाशन।
  4. बड़थ्वाल, पीताम्बर. (1995). हिन्दी काव्य की निर्गुण धारा. नई दिल्ली: तक्षशिला प्रकाशन।
  5. नगेन्द्र. (2012). हिन्दी साहित्य का इतिहास. नोएडा: मयूर पेपरबैक्स।
  6. भारती, के. एम. (2010). स्त्री विमर्श: भारतीय परिप्रेक्ष्य. नई दिल्ली: वाणी प्रकाशन।
  7. राजे, सुमन. (2006). हिंदी साहित्य का आधा इतिहास. नई दिल्ली: भारतीय ज्ञानपीठ।
  8. द्विवेदी, हजारीप्रसाद. (2012). कबीर. नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन।

Download Full Paper

Download PDF No. of Downloads:4 | No. of Views: 8