30, April 2026

अनापानसति ध्यान की भारतीय परम्परा और मानसिक स्वास्थ्य की अवधारणा : आचार्य रजनीश के सन्दर्भ में एक दार्शनिक-मनोवैज्ञानिक विमर्श

Author(s): प्रीति रानी

Authors Affiliations:

शोध छात्रा, योग विभाग, महाराजा अग्रसेन हिमालयन गढ़वाल विश्वविद्यालय, पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड

DOIs:10.2018/SS/202604008     |     Paper ID: SS202604008


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शोध सार:- आज से पहले मनुष्य इतना अशान्त नही था जितना आज है । इसलिए आज मनुष्य को ध्यान की जितनी आवश्यकता है, उससे पहले कभी नहीं थी। ओशो कहते हैं “अपने गहरे से गहरे मित्र के सामने भी अपने मन को नहीं खोल सकते, परिणाम स्वरूप तुम्हें उसे भीतर छिपाना पड़ता है। यानि दमन करना पड़ता है। डिप्रैशन और कुछ नहीं दमन है। “दमन बीमारी है। बचपन में हमें दमन करना पड़ता है। किया हुआ दमन कई बीमारियां पैदा करता है।“ मन पर तनाव अधिक हो जाता है तो मन तनाव को शरीर पर फैक देता है और शरीर पर लक्षण प्रगट होते हैं, जैसे- विभिन्न तनाव जन्य रोग, नींद न आना, भुलक्कड़पन, हृदय रोग, शुगर, कैंसर, चिड़चिड़ापन, सिर दर्द, चक्कर आना, पीठ दर्द, कंधा दर्द, लकवा इत्यादि प्रगट होती है। यह दमन का परिणाम है। ओशो रचित अनापान सती योग या विपस्सना ध्यान प्रयोग में पहले हमारे दबे हुए, दमन किए हुए भावों से मुक्त होना सिखाया जाता है। दमिन भावों से मुक्त होने की प्रक्रिया शुरू करते ही, तनाव, क्रोध, बेचैनी व अन्य शारीरिक दर्द बाहर निकलने शुरू हो जाते है। प्राचीन काल में जो ध्यान विधियां विकसित की गई थी, जिस मनुष्य के लिए की गई थी, वो मनुष्य आज नहीं है। मनुष्य के चित्त का काफी विकास हो चुका है, आज परिस्थितियां अलग है। इसलिए नये मनुष्य को नये ध्यान की आवश्यकता है। ओशो रचित ध्यान विधियां पूर्णतः वैज्ञानिक है। आचार्य रजनीश ने अनेको ध्यान विधियो की रचना तथा प्रयोगो किए। जिनमे से एक मुख्य तथा विश्व प्रसिद्ध ध्यान विधि विपस्सना ध्यान का इस शोध पत्र के माध्यम से निम्नवत किया जा रहा है।    
बीज शब्द :- योग, ध्यान , विपस्सना,ओशो, मानसिक स्वास्थ्य ।

प्रीति रानी  (2026); अनापानसति ध्यान की भारतीय परम्परा और मानसिक स्वास्थ्य की अवधारणा : आचार्य रजनीश के सन्दर्भ में एक दार्शनिक-मनोवैज्ञानिक विमर्श, Shikshan Sanshodhan : Journal of Arts, Humanities and Social Sciences,      ISSN(o): 2581-6241,  Volume – 9,   Issue –  4,  Available on –   https://shikshansanshodhan.researchculturesociety.org/


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