30, March 2026

गिरिजाकुमार माथुर विरचित ‘छाया मत छूना’ कविता की समीक्षा

Author(s): जयन्त कुमार बोरो

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साहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, कोकराझार विश्वविद्यालय, कोकराझार, असम

DOIs:10.2018/SS/202603008     |     Paper ID: SS202603008


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‘छाया मत छूना’ अतीत की स्मृतियों को छोड़ वर्तमान में जीने की प्रेरणा देने वाली कविता है । इसमें कवि ने जीवन को नवीन और उर्जावान बनाने की प्रेरणा दिया है । जीवन की वास्तविकता को छोड़ अतीत में भटकने से दुःख के सिवाय कुछ प्राप्त नहीं होता । जीवन का कठोर सत्य यही है कि वर्तमान ही सब कुछ है । वर्तमान चाहे कितना ही संघर्ष पूर्ण, कठोर, वेदना से युक्त हो उसे सहज भाव से स्वीकार कर लेना चाहिए । इस कविता में कवि की दार्शनिकता और आध्यात्मिकता का भाव झलकता है । अतीत की स्मृतियाँ सदैव कष्टदायी होती है क्योंकि उसके दिन कितने ही सुखपूर्ण क्यों ही न रहे हो, वर्तमान में उसका कोई महत्त्व नहीं रह जाता । उसे वर्तमान में याद करना अर्थपूर्ण नहीं है । कवि यह स्पष्ट करते है कि तुम स्वयं को प्रभुत्व सम्पन्न क्यों न समझ लो, वह एक प्रकार की मृगतृष्णा है । रेगिस्तान में मृग पानी प्यास के मारे इधर-उधर भटकता फिरता है फिर भी उसे जल की प्राप्ति नहीं होती है । उसकी प्यास ज्यों की त्यों बनी रहती है । इस जगत में लालसा से आसक्त मनुष्य सदैव दौड़ लगा रहा है । एक दूसरे की प्रतिस्पर्धा लगा रखा है । पर क्या यही वास्तविक आनन्द है ? वास्तविक आनन्द के लिए मृगतृष्णा को त्याग कर वर्तमान भावजगत में विचरण करना होगा । अतः प्रत्येक प्रकाश के पीछे अंधकार छिपा है या यूँ कहें कि प्रत्येक अंधकार के पीछे प्रकाश विद्यमान है ।
वर्तमान, उर्जावान, प्रेरणा, आध्यात्मिकता, स्मृति, मृगतृष्णा, प्रतिस्पर्धा, आनन्द

जयन्त कुमार बोरो (2026); गिरिजाकुमार माथुर विरचित ‘छाया मत छूना’ कविता की समीक्षा,  Shikshan Sanshodhan : Journal of Arts, Humanities and Social Sciences,      ISSN(o): 2581-6241,  Volume – 9,   Issue –  3,  Available on –   https://shikshansanshodhan.researchculturesociety.org/

1. भीतरी नदी का यात्रा (काव्य संग्रह की भूमिका से) – गिरिजाकुमार माथुर ।
2. छाया मत छूना (कविता) – तारसप्तक (द्वितीय संस्करण) पृष्ठ- 177 .
3. वहीं, पृष्ठ- 177 .
4. वहीं, पृष्ठ- 177 .
5. तारसप्तक (द्वितीय संस्करण) : स. अज्ञेय, पृष्ठ- 123.


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