‘कामायनी’ में प्रकृति-बोध और पारिस्थितिक चेतना : एक पर्यावरणीय पुनर्पाठ
Author(s): दीपिका राणा
Authors Affiliations:
शोधार्थी , डॉ बी आर अम्बेडकर विश्विद्यालय, दिल्ली
DOIs:10.2018/SS/202609003     |     Paper ID: SS202609003शोध-सार: जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ हिंदी साहित्य की ऐसी महत्त्वपूर्ण कृति है जिसमें मानव-मन, प्रकृति, सभ्यता, संस्कृति, दर्शन और जीवन-मूल्यों का व्यापक एवं बहुआयामी चित्रण दिखाई देता है। सामान्यतः ‘कामायनी’ का अध्ययन दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक तथा मानवतावादी दृष्टियों से किया जाता रहा है, किंतु वर्तमान पर्यावरणीय संकट के संदर्भ में इस कृति का पारिस्थितिक पुनर्पाठ विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो उठता है। ‘कामायनी’ में प्रकृति केवल काव्य-सौंदर्य की पृष्ठभूमि नहीं है, बल्कि वह मनुष्य और सभ्यता के अस्तित्व से गहरे रूप में जुड़ी हुई सक्रिय शक्ति है। प्रलय का चित्रण, देव-संस्कृति की विलासिता, प्रकृति के प्रति मनुष्य का असंतुलित व्यवहार, मनु का एकाकी जीवन, श्रद्धा के माध्यम से प्रकृति और जीवन के साथ पुनः जुड़ाव तथा इड़ा के माध्यम से विकसित होती सभ्यता—ये सभी प्रसंग मानव और प्रकृति के संबंध की जटिलता को सामने लाते हैं। इस दृष्टि से ‘कामायनी’ का प्रलय केवल पौराणिक घटना न रहकर सभ्यतागत असंतुलन के प्रतीक के रूप में भी देखा जा सकता है। प्रस्तुत शोध में ‘कामायनी’ के प्रकृति-बोध को आधुनिक पारिस्थितिक चेतना के संदर्भ में पुनर्व्याख्यायित करने का प्रयास किया गया है। अध्ययन यह स्थापित करता है कि प्रसाद का प्रकृति-दर्शन मनुष्य को प्रकृति का स्वामी मानने के स्थान पर उसके साथ सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व की ओर प्रेरित करता है। कृति में प्रकृति के जीवनदायिनी, सौंदर्यमयी, विनाशकारी और पुनर्सृजनकारी रूपों के माध्यम से यह संकेत मिलता है कि मनुष्य की वास्तविक प्रगति प्रकृति के शोषण में नहीं, बल्कि उसके साथ संतुलित संबंध में निहित है। इस प्रकार ‘कामायनी’ आज के जलवायु संकट, प्राकृतिक संसाधनों के अति-दोहन, प्रदूषण, जैव-विविधता के क्षरण और अनियंत्रित उपभोग के समय में एक महत्त्वपूर्ण पर्यावरणीय चेतावनी के रूप में पढ़ी जा सकती है।
दीपिका राणा (2026); ‘कामायनी’ में प्रकृति-बोध और पारिस्थितिक चेतना : एक पर्यावरणीय पुनर्पाठ, Shikshan Sanshodhan : Journal of Arts, Humanities and Social Sciences, ISSN(o): 2581-6241, Volume – 9, Issue – 9, Available on – https://shikshansanshodhan.researchculturesociety.org/
![SHIKSHAN SANSHODHAN [ ISSN(O): 2581-6241 ] Peer-Reviewed, Referred, Indexed Research Journal.](https://shikshansanshodhan.researchculturesociety.org/wp-content/uploads/SS-TITLE-HEADER.png)