नारीवादी इतिहास-लेखन और आधुनिक भारतीय इतिहास (स्रोत, स्वर और सत्ता की पुनर्व्याख्या: एक ऐतिहासिक-आलोचनात्मक अध्ययन)
Author(s): कृष्ण कुमार सिंह
Authors Affiliations:
अतिथि प्रवक्ता (इतिहास विभाग),
कालिंदी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय नई दिल्ली
DOIs:10.2018/SS/202603015     |     Paper ID: SS202603015सार (Abstract): यह शोध-पत्र आधुनिक भारतीय इतिहास-लेखन में नारीवादी दृष्टिकोण के उदय, उसकी पद्धतिगत विशिष्टताओं और उसके द्वारा प्रस्तुत चुनौतियों का विश्लेषण करता है। परंपरागत औपनिवेशिक और राष्ट्रवादी इतिहास-लेखन में स्त्री प्रायः एक निष्क्रिय विषय के रूप में उपस्थित रही, जबकि नारीवादी इतिहासकारों ने उसे इतिहास के केंद्र में स्थापित करने का प्रयत्न किया। लता मणि, पार्था चटर्जी, उमा चक्रवर्ती, तनिका सरकार, गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक तथा सूसी थारू एवं के. ललिता जैसे विद्वानों के कार्यों के आधार पर यह पत्र दर्शाता है कि किस प्रकार सती-प्रथा पर औपनिवेशिक बहस, राष्ट्रवादी “स्त्री-प्रश्न”, जाति-आधारित पितृसत्ता, तथा हिंदू सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में स्त्री-शरीर की भूमिका — इन सभी क्षेत्रों में स्त्री की आवाज़ को या तो नियंत्रित किया गया या पूर्णतः अनुपस्थित रखा गया। यह पत्र यह भी परीक्षण करता है कि नारीवादी इतिहासकारों ने अभिलेखीय स्रोतों, आत्मकथाओं और साहित्यिक ग्रंथों के माध्यम से स्त्रियों की उपेक्षित आवाज़ों को किस प्रकार पुनः प्राप्त करने का प्रयास किया। निष्कर्षतः यह तर्क प्रस्तुत किया गया है कि नारीवादी इतिहास-लेखन केवल स्त्रियों को इतिहास में “जोड़ने” की परियोजना नहीं, बल्कि इतिहास-लेखन की स्वयं की श्रेणियों, स्रोतों और सत्ता-संरचनाओं पर प्रश्न उठाने वाली एक मौलिक पद्धतिगत हस्तक्षेप है।
कृष्ण कुमार सिंह (2026); नारीवादी इतिहास-लेखन और आधुनिक भारतीय इतिहास (स्रोत, स्वर और सत्ता की पुनर्व्याख्या: एक ऐतिहासिक-आलोचनात्मक अध्ययन), Shikshan Sanshodhan : Journal of Arts, Humanities and Social Sciences, ISSN(o): 2581-6241, Volume – 9, Issue – 3, Available on – https://shikshansanshodhan.researchculturesociety.org/
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