अभिजातीय मुगल चित्रकला के विपरीत, अलौकिक स्वछन्दता से परिपूर्ण राजपूत लघुचित्रकला
Author(s): Manjeet Singh, Dr. Rina Singh
Authors Affiliations:
1 Research Scholar, Department of Visual Arts (Drawing and Painting), D.S.B. Campus, Kumaun University, Nainital, Uttarakhand, India
2 Associate Professor, Department of Visual Arts (Drawing and Painting), D.S.B. Campus, Kumaun University, Nainital, Uttarakhand, India
DOIs:10.2018/SS/202601008     |     Paper ID: SS202601008सारांश: मानव की बौद्धिक क्षमता कला की जन्मदात्री कहलाती है। इसलिए कला की उत्पत्ति उतनी ही प्राचीन है जितना की स्वयं मानव। कला के क्षेत्र में मानव के सबसे शुरुआती प्रयास अति सरल व अनौपचारिक थे। परंतु मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ कला के स्तर और रूपों का भी विकास हुआ। कला विभिन्न रूपों के साथ संसार की विभिन्न मानव सभ्यताओं के अधीन पनपती रही। इन सभ्यताओं या आश्रयदाताओं का वहाँ की कला पर विशेष प्रभाव रहा। यही वजह है कि दुनिया के विभिन्न प्रांतों की कला उस प्रांत विशेष की सभ्यता, संस्कृति और परंपरा का आईना कहलाती है। विश्व की कुछ अति प्राचीन कला सभ्यताओं में भारत की कला सभ्यता महत्वपूर्ण स्थान रखती है। क्योंकि भारतीय संस्कृति विभिन्नताओं से भरी पड़ी है अतः यहाँ की कला भी भिन्नताएं लिए हुए है। चित्रकला के रूप में भारतीय कला अति महत्वपूर्ण व प्राचीनतम मानी जाती है। भारतीय चित्रकला विकास के पथ पर चलते हुए कई पड़ावों से गुजरी। इसने भारतीयता के साथ-साथ विदेशी प्रभावों को भी अनुभव किया। विभिन्न शैलियों के रूप में भारतीय चित्रकला विभिन्न धर्मों, जातियों और संस्कृतियों के संरक्षण में इतिहास के पथ पर अग्रसर हुई। इनमे से दो प्रसिद्ध भारतीय चित्र शैलियाँ हैं- मुगल शैली और राजपूत शैली। मुगल शैली मूलतः विदेशी होने के कारण अधिकतर अपने शासक और अभिजात वर्ग की महिमा का व्याख्यान करती दिखाई देती है। जबकि राजपूत लघुचित्र शैली अपने राजस्थानी व पहाड़ी रूपों में भारतीय कला के पारंपरिक मूल्यों व सिद्धांतों पर अधिक बल देती हुई कला और चित्रकार की अलौकिक स्वछन्दता को प्रकट करती है। यह शोध अध्ययन वर्णनात्मक शोध पद्धति के आधार पर यह तथ्य प्रस्तुत करता है कि अभिजातिय मुगल चित्रकला भारतीय चित्रकला के पारंपरिक मूल्यों व सिद्धांतों की अपेक्षा भौतिक मूल्यों पर केंद्रित रही।
Manjeet Singh, Dr. Rina Singh (2026); अभिजातीय मुगल चित्रकला के विपरीत, अलौकिक स्वछन्दता से परिपूर्ण राजपूत लघुचित्रकला, Shikshan Sanshodhan : Journal of Arts, Humanities and Social Sciences, ISSN(o): 2581-6241, Volume – 9, Issue – 1, Available on – https://shikshansanshodhan.researchculturesociety.org/
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