Abstract: प्रस्तुत शोध पत्र 1947 के भारत विभाजन की जटिल राजनीतिक प्रक्रियाओं, वैचारिक संघर्षों और विभिन्न संगठनों की भूमिका का एक गहन विश्लेषण प्रदान करता है। विभाजन केवल एक भौगोलिक बँटवारा नहीं था, बल्कि यह औपनिवेशिक नीतियों, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और रणनीतिक विफलता की परिणति थी। यह लेख भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की 'अखंड भारत' की अवधारणा और मुस्लिम लीग के 'द्वि-राष्ट्र सिद्धांत' के बीच के वैचारिक द्वंद्व का परीक्षण करता है।इसके अतिरिक्त, यह शोध पत्र मुख्यधारा के दलों से इतर हिंदू महासभा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अकाली दल, कम्युनिस्ट पार्टी और खुदाई खिदमतगार जैसे संगठनों के प्रभाव को रेखांकित करता है, जिन्होंने विभाजन की दिशा और गति को प्रभावित किया। लेख में मोहम्मद अली जिन्ना, जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गांधी और सरदार पटेल जैसे प्रमुख व्यक्तित्वों के दृष्टिकोणों और उनके द्वारा लिए गए निर्णयों का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। अंतिम खंडों में, कैबिनेट मिशन की विफलता से लेकर माउंटबेटन योजना की जल्दबाजी और रेडक्लिफ रेखा द्वारा उत्पन्न मानवीय त्रासदी का विवरण दिया गया है। अंततः, यह शोध पत्र यह निष्कर्ष निकालता है कि विभाजन ने न केवल उपमहाद्वीप के भूगोल को बदला, बल्कि एक ऐसी स्थायी राजनीतिक और सामाजिक विरासत छोड़ी जो आज भी दक्षिण एशिया के द्विपक्षीय संबंधों और सांप्रदायिक विमर्श को प्रभावित करती है।
Key Words (मुख्य शब्द): विभाजन, मुस्लिम लीग, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, द्वि-राष्ट्र सिद्धांत, रेडक्लिफ रेखा, सांप्रदायिकता, माउंटबेटन योजना।
Meenakshi Rawat, Dr Dilawar Nabi Bhat (2026); भारत के विभाजन (1947) में मुस्लिम लीग, कांग्रेस तथा अन्य राजनीतिक संगठनों और प्रमुख नेताओं की भूमिका का समग्र विश्लेषण, Shikshan Sanshodhan : Journal of Arts, Humanities and Social Sciences, ISSN(o): 2581-6241, Volume – 9, Issue – 3, Available on – https://shikshansanshodhan.researchculturesociety.org/