26, February 2026

राज, ज़मींदारी और प्रतिरोध: प्रतापगढ़ का किसान संघर्ष (1915–1925)

Author(s): Dr.Munendra Singh

Authors Affiliations:

असिस्टेंट प्रोफेसर, इतिहास एवं एशियन कल्चर विभाग, शिया पी.जी. कॉलेज, लखनऊ

DOIs:10.2018/SS/202602006     |     Paper ID: SS202602006


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सारांश:  यह शोध-पत्र औपनिवेशिक भारत के उत्तर भारतीय क्षेत्र अवध के प्रतापगढ़ ज़िले में 1915 से 1925 के बीच उभरे किसान संघर्षों का ऐतिहासिक, समाजशास्त्रीय तथा सैद्धांतिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन, ज़मींदारी व्यवस्था और ग्रामीण समाज के अंतर्संबंधों के संदर्भ में यह अध्ययन यह दर्शाता है कि किस प्रकार किसानों ने आर्थिक शोषण, सामाजिक अधीनता और संस्थागत अन्याय के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध विकसित किया। किसान सभाओं, पंचायत-आधारित न्याय, सामूहिक बहिष्कार और अहिंसक अवज्ञा जैसे रूपों के माध्यम से प्रतापगढ़ के किसानों ने न केवल तात्कालिक आर्थिक मांगें उठाईं, बल्कि ग्रामीण राजनीतिक चेतना और कृषक एजेंसी को भी पुनर्परिभाषित किया। यह अध्ययन एरिक स्टोक्स, रणजीत गुहा, डेविड हार्डिमैन और शाहिद अमीन जैसे इतिहासकारों के कार्यों से संवाद करते हुए मार्क्सवादी तथा सबाल्टर्न दृष्टियों को एकीकृत करता है।

 

 

मुख्य शब्द : प्रतापगढ़, किसान आंदोलन, ज़मींदारी, औपनिवेशिक भारत, किसान सभा, सबाल्टर्न अध्ययन ।

Dr.Munendra Singh (2026); राज, ज़मींदारी और प्रतिरोध: प्रतापगढ़ का किसान संघर्ष (1915–1925), Shikshan Sanshodhan : Journal of Arts, Humanities and Social Sciences,      ISSN(o): 2581-6241,  Volume – 9,   Issue –  2,  Available on –   https://shikshansanshodhan.researchculturesociety.org/


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