30, January 2026

भारत की विदेश नीति में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का व्यवहारिक स्वरूप: एक समसामयिक अद्ययन (2014 के पश्चात)

Author(s): 1 Dr. Usha Agrwal, 2 Jitendra Gavriya

Authors Affiliations:

¹  Head,Department of History,PM College of excellence, Mandsour, Samrat Vikramaditya University, Ujjain (M.P.), India

2 Research Scholar, PM College of excellence, Mandsour, Samrat Vikramaditya University, Ujjain (M.P.), India

DOIs:10.2018/SS/202601009     |     Paper ID: SS202601009


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वसुधैव कुटुम्बकम्’’ भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण दर्शन है। जिसमें सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार माना गया है। इस दर्शन का मूल भाव यह है कि समस्त विश्व एक ही जीवन ऊर्जा से निर्मित है, इसलिए सभी मनुष्य परस्पर संबंधित हैं। अतः मानवता, सह-अस्तित्व और वैश्विक एकता की भावना इसमें विद्यमान है।

वर्तमान में भारत की इस प्राचीन अवधारणा को वैश्विक संदर्भ में मूर्त रूप प्राप्त हुआ है। विशेषतः 2014 के पश्चात भारत की विदेश नीति में वसुधैव कुटुम्बकम् ने व्यावहारिक कूटनीतिक सिद्धांत के रूप में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया है। जैसे G20 की अध्यक्षता के दौरान “एक पृथ्वी, एक परिवार एक भविष्य” का सूत्र, अंतर्राष्ट्रीय सौर ठबंधन द्वारा नवीकरणीय ऊर्जा सहयोग, वैक्सीन मैत्री पहल के माध्यम से कोविड-19 टीकों की आपूर्ति तथा ऑपरेशन दोस्त जैसी मानवीय सहायता पहल, ये सभी कदम स्पष्टतः वसुधैव कुटुंबकम् के भारतीय विदेश नीति में व्यावहारिक पक्ष को दर्शाते हैं। इससे भारत को वैश्विक स्तर पर परस्पर सहयोग और मानव-केन्द्रित दृष्टिकोण को और अधिक सशक्त बनाने का अवसर प्राप्त हुआ है।

यह शोध पत्र गुणात्मक एवं विश्लेषणात्मक पद्धति पर आधारित है, जिसका उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि भारत ने किस प्रकार अपने सांस्कृतिक-दार्शनिक मूल्यों को समकालीन वैश्विक कूटनीति में सफलतापूर्वक रूपांतरित किया है।

वसुधैव कुटुम्बकम्, भारतीय विदेश नीति, G20, वैक्सीन मैत्री, अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन, आपदा राहत।

Dr. Usha Agrwal,  Jitendra Gavriya (2026); भारत की विदेश नीति में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का व्यवहारिक स्वरूप: एक समसामयिक अद्ययन (2014 के पश्चात), Shikshan Sanshodhan : Journal of Arts, Humanities and Social Sciences,      ISSN(o): 2581-6241,  Volume – 9,   Issue –  1,  Available on –   https://shikshansanshodhan.researchculturesociety.org/

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