30, July 2026

संत रविदासः वाणी का विश्लेषणात्मक अध्ययन

Author(s): डॉ सुमन देवी

Authors Affiliations:

सहायक प्रवक्ता हिंदी, राजकीय महावि‌द्यालय, हिसार

DOIs:10.2018/SS/202607024     |     Paper ID: SS202607024


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सन्त बड़े बेढ़ब होते हैं । उनकी वाणी का मूल्यांकन करना एक दुष्कर कार्य है । सन्त हो पुष्प की तरह स्वतः प्रस्फुदित होते हैं और अपनी सुगन्ध को चतुर्दिक फैलाकर, इस संसार से चले जाते हैं ।1 सन्त शिरोमणि रविदास इस कथन के अपवाद नहीं हैं। संत शिरोमणि रविदास आत्मविश्वास एवं आत्मनिवेदन में मग्न ब्रह्मलीन साधक थे । प्रायः इस युग में सभी संत आत्मप्रदर्शन से सर्वथा दूर ही रहे । कैसी विडम्बना है कि इसी युग के संत रविदास जाति से अछूत होने के साथ-साथ पठन-पाठन से भी दूर ही रहे थे । यही वह मुख्य कारण है, जिससे उनकी सहज-अनुभूति पूर्ण वाणी अधिक देखने को नहीं मिलती है, जो कुछ वाणी उनके शिष्यों या परवर्ती शिष्यों ने सुनकर लिपिबद्ध की है।2  फिर भी जो उनकी हस्तलिखित वाणी या उसके आधार पर वाणी के प्रकाशित ग्रन्थ उपलब्ध हैं, उन्हीं के आधार पर ही उनका विवेचन प्रस्तुत किया जाता है । संत रविदास की वाणी में निहित आत्म-निवेदन विनयभाव की अभिव्यक्ति, वाणी की सहजता के रूप में ही अनुगामी पाठक-श्रोता-समाज को संवेदित करती रही है। इस संबंध में सन्त रज्जब अली का प्रस्तुत दोहा, रचनाकार को शब्दों में बाँधकर मुखर करता जान पड़ता है । कवि-वाणी की समीक्षा करने से पहले अनुभूति के धरातल पर रचनाकार की संवेदना को समझना बहुत आवश्यक है 3

 

 बीज शब्द :-  आत्मनिवेदन , ब्रह्मलीन, आत्मप्रदर्शन, संवेदित, परवर्ती, प्रस्फुदित, चतुर्दिक ।

डॉ सुमन देवी (2026); संत रविदासः वाणी का विश्लेषणात्मक अध्ययन, Shikshan Sanshodhan : Journal of Arts, Humanities and Social Sciences,      ISSN(o): 2581-6241,  Volume – 9,   Issue –  7,  Available on –   https://shikshansanshodhan.researchculturesociety.org/

संदर्भ सूची :

  1. डॉ. बाबूराम, संत शिरोमणि ब्रह्मानन्द सरस्वती, पृ. 49
  2. डॉ. उमेश कुमार सिंह, गुरु नानक देव और संत रविदास एक तुलनात्मक अध्ययन, पृ. 55
  3. डॉ. रमेशचन्द्र मिश्र, सन्त रैदास वाणी और विचार में, रैदास वाणी कृतित्व, पृ. 35 है ।’
  4. २. बा. 145/2
  5. डॉ. रमेशचन्द्र मिश्र संत रैदास वाणी और विचार, पु. 37
  6. सम्पा., डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, हिन्दी साहित्य कोश 2, संस्करण, संवत् 2020, पृ॰ 509
  7. डॉ. रमेशचन्द्र मिश्र, सन्त रैदास : वाणी और विचार, पृ. 40
  8. डॉ. योगेन्द्र सिंह, संत रैदास, पृ. 36
  9. डॉ. रामकुमार वर्मा, हिन्दी साहित्य सन्त काव्य, पृ॰ 160-161
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  11. डॉ. उमेश कुमार सिंह, गुरु नानक देव और संत रविदास एक तुलनात्मक अध्ययन, पृ० 60
  12. आचार्य, हजारीप्रसाद द्विवेदी, रविदास दर्शन (दो शब्द)
  13. आचार्य पृथ्वी सिंह आजाद, गुरु रैदास, पृ॰ 55, 1975
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  15. वही, पृ० 191
  16. डॉ. राधाकृष्णन, हिन्दुओं का जीवन-दर्शन, पृ. 70
  17. डॉ. राधाकृष्णन, हिन्दुओं का जीवन-दर्शन, पृ. 106
  18. डॉ. मदन गोपाल गुप्त, मध्यकालीन हिन्दी काव्य में भारतीय संस्कृति,पृ. 66
  19. डॉ. उमेश कुमार सिंह, गुरु नानक देव और संत रविदास, पृ. 127
  20. गुरु रविदास वाणी, पद 51, पृ. 91
  21. इंद्रराज सिंह, संत रविदास, पृ॰ 117
  22. डॉ. पुष्पा गोयल, गुरु नानक प्रकाश : काव्य, संस्कृति और दर्शन, पृ॰ 58
  23. डॉ. पुष्पा गोयल, गुरु नानक प्रकाश : काव्य, संस्कृति और दर्शन, पृ० 79
  24. रैदास वाणी, पद 64 सौ कहा जाने पीर पराई । जाके दिल में दरद न आई
  25. वही, पृ. 78
  26. हजारीप्रसाद द्विवेदी, नाथ सम्प्रदाय, पृ. 1
  27. कोमल सिंह सोलंकी, नाथ पंथ और निर्गुण सन्त-काव्य, पृ॰ 130
  28. आचार्य परशुराम चतुर्वेदी, संत काव्य, पृ॰ 62
  29. रैदास वाणी, पद 71

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