मोहन राकेश की कहानियों में आधुनिक दाम्पत्य जीवन: एक मनोवैज्ञानिक अध्ययन
Author(s): निर्मला परेवा, डा. संजू झा
Authors Affiliations:
1शोधार्थी, हिंदी विभाग, महाराज विनायक ग्लोबल विश्वविद्यालय, ढण्ढ आमेर,जयपुर, भारत
2शोध निर्देशिका, हिंदी विभाग, महाराज विनायक ग्लोबल विश्वविद्यालय, ढण्ढ आमेर, जयपुर, भारत
DOIs:10.2018/SS/202608005     |     Paper ID: SS202608005सारांश: नई कहानी आंदोलन में आधुनिक दृष्टिकोण को व्यक्तिगत बनाने वाले मोहन राकेश ने अपनी कहानियों का मुख्य विषय आधुनिक जीवन की जटिलताओं, बदलते सामाजिक मूल्यों और मानवीय संबंधों के विघटन को बनाया है। जब वे वर्तमान जीवन की विसंगतियों, संवादहीनता, भावनात्मक अलगाव और व्यक्तिगत संघर्षों को चित्रित करते हैं तब विशेष रूप से उनके कथा-साहित्य में दाम्पत्य संबंध बहुत प्रभावी रूप से अभिव्यक्त होते हैं। मोहन राकेश की कहानियों के आधार पर प्रस्तुत शोध पत्र का उददेश्य आधुनिक दाम्पत्य जीवन के मनोवैज्ञानिक पहलुओं का विश्लेषण करना है। यह अध्ययन उनकी कहानियों के माध्यम से पति-पत्नी संबंधों में आने वाले मानसिक द्वंद्व, अहं-बोध, अकेलापन, असुरक्षा, संवादहीनता, आत्म-पहचान की खोज और भावनात्मक विखंडन का विश्लेषण करता है। अध्ययन से पता चलता है कि मोहन राकेश के कथा-साहित्य में दाम्पत्य संबंध केवल सामाजिक संस्थाओं के रूप में नहीं आते, बल्कि आज की आदमी की मानसिक संरचना और अस्तित्वगत संकटों के प्रतीक बनते हैं। उनके पात्रों ने पारंपरिक वैवाहिक मूल्यों और आधुनिक व्यक्तिवादी मानसिकता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की, लेकिन यह संघर्ष उनके रिश्ते में तनाव और मानसिक अस्थिरता पैदा करता है। विशेष रूप से, लेखक ने मध्यवर्गीय जीवन की परिस्थितियों में दाम्पत्य संबंधों की बदलती प्रवृति और उनके मनोवैज्ञानिक प्रभावों का बहुत सटीक और भावुक चित्रण किया है। इस शोध पत्र का उददेश्य मोहन राकेश की कहानियों के माध्यम से हिंदी कथा-साहित्य में मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद का सशक्त चित्रण करना और आधुनिक दाम्पत्य जीवन की मनोवैज्ञानिक जटिलताओं को समझने के लिए महत्वपूर्ण साहित्यिक सामग्री प्रस्तुत करना है।
निर्मला परेवा, डा. संजू झा (2026); मोहन राकेश की कहानियों में आधुनिक दाम्पत्य जीवन: एक मनोवैज्ञानिक अध्ययन, Shikshan Sanshodhan : Journal of Arts, Humanities and Social Sciences, ISSN(o): 2581-6241, Volume – 9, Issue – 8, Available on – https://shikshansanshodhan.researchculturesociety.org/
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